जगह जगह पर हिंदू देवताओं के स्थान मिलने जहां एक ओर सनातनियों के मन में प्रसन्नता है तो वहीं दूसरी ओर एक बहुत बड़े संगठन का कहना है कि हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों ढूंढना ?
सनातन🚩समाचार🌎गुजरात के भरूच स्थित ऐतिहासिक जामा मस्जिद एक बार फिर चर्चा में है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है, जिसमें मस्जिद के तहखाने के भीतर भगवान गणेश, हनुमान और जैन तीर्थंकर मल्लिनाथजी की प्राचीन मूर्तियां दिखाई दे रही हैं।
यह फुटेज उस दावे को मजबूती प्रदान करता है, जिसे लंबे समय से हिंदू संत और विभिन्न सामाजिक संगठन उठाते रहे हैं कि यह मस्जिद प्राचीन मंदिरों के अवशेषों पर निर्मित की गई है।भरूच के स्वामी मुक्तानंद ने इस वीडियो की सत्यता की पुष्टि करते हुए कहा कि यह पुरानी ऐतिहासिक सच्चाइयों को उजागर करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इतिहास को लंबे समय तक दबाया या मिटाया नहीं जा सकता और आज जनमानस के सामने वास्तविक तथ्य स्पष्ट हैं। संतों का मानना है कि यह स्थान सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
स्वामी मुक्तानंद ने केंद्र सरकार के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग यानी एएसआई की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह जामा मस्जिद एक संरक्षित स्मारक है, लेकिन इसके प्रबंधन में नियमों का खुला उल्लंघन किया जा रहा है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि इस स्थल का संचालन पूरी तरह से एएसआई के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत हो और यहां होने वाली किसी भी प्रकार की अनधिकृत गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।स्थानीय प्रशासन ने हाल ही में मस्जिद परिसर के आसपास की गई अवैध निर्माण गतिविधियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।
अधिकारियों ने वहां बनाए गए एक अनधिकृत शेड को तोड़कर अतिक्रमण मुक्त कराया है। इसके अतिरिक्त, सुरक्षा और विवाद को देखते हुए तहखाने तक जाने वाले एक मुख्य द्वार को भी सील कर दिया गया है। फिलहाल, इस पूरे प्रकरण के बाद से क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है और पूरे मामले पर गहन विश्लेषण की मांग की जा रही है।
फिलहाल, यह मामला केवल एक विवाद तक सीमित नहीं रह गया है।इस विषय पर दो मुख्य कानूनी पक्ष सामने आ रहे हैं:साक्ष्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण: हिंदू पक्ष की मांग है कि एएसआई द्वारा इस पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण या खुदाई की जाए ताकि मंदिरों के अवशेषों का स्पष्ट पता लगाया जा सके।
प्रबंधन की जिम्मेदारी: संतों और संगठनों का तर्क है कि यदि यह स्थान एक संरक्षित स्मारक है, तो इसका नियंत्रण पूर्णतः सरकारी हाथों में होना चाहिए न कि किसी निजी संस्था के पास। उनका कहना है कि किसी भी प्रकार की नमाज या धार्मिक आयोजन जो एएसआई के नियमों के विरुद्ध हैं, उन्हें बंद किया जाना चाहिए।प्रशासनिक स्तर पर।






